अशोक पटेल “आशु”, तुस्मा,शिवरीनारायन(छत्तीसगढ़)
“बासी के गोठ निघथे त पेट नइ, सीधो मन हर अघा जाथे, अउ आमा के अथान के खटास मिल जाथे त जिनगी के हर एक पाटा सुग्घर लागे लागथे।”
हमर छत्तीसगढ़ के जब भी बात आथे, त सबले पहिली इहाँ के पहिचान के ही बात होथे। आखिर हमर छत्तीसगढ़ के पहिचान का हरे? इहाँ के खेती-किसानी, बखरी-बारी, तरिया-नरवा, कछार-टिकरा, सरार-भदका, गढ़-डोंगर, नदिया-झरना अउ फेर इहाँ रोजी-मंजूरी करइया खेतिहार किसान मन ही तो हमर असल आन-बान-मान हें।
एकर अलावा इहाँ के बोली-भाखा, रहन-सहन, रीति-रिवाज, संस्कृति-सभ्यता, पहनावा-ओढ़ावा अउ आख़री म इहाँ के खान-पान—इही मन तो हमर छत्तीसगढ़ के असली पहिचान आय।
चटनी-अथान बिना अधूरा हे छत्तीसगढ़ी खान-पान
ए पहिचान म जब खान-पान के बात आथे त इहाँ के छत्तीस प्रकार के रोटी-पीठा घलो हर याद आ जाथे। पर एक बात हे! हमर ए खान-पान म भले ही हमन कतको रोटी-पीठा के बात कर लीन, लेकिन एहर अधूरा ही आय। काबर की ए रोटी-पीठा मन चटनी अउ अथान बिना अकारज आय। चटनी हे त रोटी-पीठा, अथान हे त भात बासी!
मै बात करथंव इहाँ के अथान के, जेकर बिना हमर छत्तीसगढ़ के खान-पान हर सम्यक सुना हे। चटनी के जगह म इही अथान हर तो बरमासी काम आथे। अउ हमर छत्तीसगढ़ के रोजी मंजूरी करइया किसान भाई, माटीपुत्र मन एही भरोसा म तो दिन भर पसीना गार के काम-बूता ला कर पाथें। घर म कोनो साग-सालन झन बनय, कोइ संसो-फीकर नई रहय—बिहनिया ले उड़त-बुड़त दिन भर अपन काम ला कर डारथें।
आमा अथान डारे के पारंपरिक जुगत: ‘भरवां अथान’ के जादू
हमर छत्तीसगढ़ म अथान बनाय के रिवाज हमर पुरखा मन ले चला आवत हे, जेला हमन आज भी गांव-गंवई म देख सकत हन।
जेठ के महीना हर जब आथे त घरो-घर आमा अथान के मसाला ढेंकी म कुटाय लागथे। गांव के खोर, गली, मोहल्ला हर महमहा जाथे। अउ फेर सुरु होथे आमा अथान डारे के कारज! हमर छत्तीसगढ़ म आमा के अथान डारथें त, आमा ला कुटी-कुटी नइ करय, ओला सरोता म काटे के बेरा ठाढ़ करके काटे जाथे, उहू ल बस दु-घ! अउ ए बात के ध्यान राखे जाथे कि ओहर सउघे रहय, ओमा ले एको ठन फांकी कट के अलग झन होय।
जब जम्मों आमा कटा जाथे, त फेर ओ आमा मन के गोहीं (गुठली) मन ला सुजा (सलाखों) के सहारा से निकाल लेथें। जब जम्मों आमा ले गोहीं निकल जाथे, तब फेर कुटाय बुकनी—जेमा हरदी, मीरचा, नून, लसून, अउ सरसों रहिथे—ओला कटा हुआ सउघे आमा के भीतर कोंच-कोंच के भरे जाथे। अउ फेर ओला माटी के मरका (मर्तबान) म कले चुप धर दिये जाथे। एला हमर छत्तीसगढ़ म कहे जाथे— “भरवां अथान!”
बटकी म बासी अउ कटोरी म अथान: माटीपुत्र मन के ऊर्जा के स्त्रोत
ए भरवां आमा अथान म ही तो हमर छत्तीसगढ़ के असली पहिचान समाए हावय। बटकी म बासी अउ कटोरी म भरवां आमा के अथान—यदि ए दोनों मिल जाय, त बासी के मीठास के का कहना!
इही बासी अउ आमा अथान म सम्यक छत्तीसगढ़ हर बसथे। रोजी-मंजूरी, खेती-किसानी अउ इहाँ के माटीपुत्र किसान मन एरे भरोसा म धरती दाई के सेवा करत, मेहनत-मंजूरी अउ श्रम के पूजा करथें। कोनो दिन होवय, कोनो मौसम होवय, अउ फेर कोनो किसम के बूता होवय—बिना बासी अथान खाय अउ बिना बासी अथान धरे, हमर छत्तीसगढ़ के खेतिहर किसान भाई-बहिनी मन घर ले निकलबेच नइ करय।
श्रम के पूजा अउ बासी-अथान के सुग्घर मेल
खेत-खार, बखरी-बारी, भदका-सरार या फेर नदिया कछार के बूता करइया श्रम के जम्मों पुजारी मन, ए धरती के रतन बेटा माटीपुत्र बासी-अथान ले ही अपन जिनगी के सुरुआत करथें, अउ एकरे भरोसा म दिन भर जांगर तोर के बूता कर पाथें।
पसीना बोहावत, जांगर तोरत ठाढ़ बेरा म जब श्रम के पूजा करत, पसीना ले धरती के माटी ला सिंचित करथें, अउ जब बासी अथान के भोग लगाथें, तब ए श्रम करइया अउ माटी दुन्नो तृप्त हो जाथें, अघा जाथें। खेत-खार जम्मों हर बासी के मीठास अउ भरवा अथान के चटक स्वाद म महमहा जाथे। रद्दा रेंगइया मन घलो ठिठक के देखे लागथें अउ बासी-भरवां अथान के स्वाद म रंग जाथें!
संगवारी हो, सच म, हमर बासी अउ आमा अथान सिरिफ खाय के जिनिस नइ ये, बल्कि हमर छत्तीसगढ़ के संस्कृति, मया अउ मेहनत के बड़ बड़े परमान आय!
