लेखक: चन्द्रकांत खुंटे ‘क्रांति’, जांजगीर-चाम्पा (छत्तीसगढ़)
हरियर भुंइयाँ, अगास में मड़रावत करिया बदरा, अउ कोंपल मारत धान के पौधा… बस इही ए हमर मयारू छत्तीसगढ़ के असली चिनहारी। दुनिया में कतको सुग्घर ठउर होही, कतको चकाचौंध होही, पर जउन सुकूँन अउ आत्मीयता हमर छत्तीसगढ़ के खेती-खार अउ माटी में हे, ओ सरी संसार के कउनो अउ कोनहा में नइ मिलय। हमर भुइँया ला जुग-जुग से ‘धान के कटोरा’ कहे जाथे। ये सिरिफ एक ठो नाम नो हे, ये हमर पहिचान ए, हमर पुरखा मन के असीस ए, अउ हमर संस्कृति के परान ए।
जब सावन-भादों के महीना आथे, त हमर धान के कटोरा कतका सुंदर दिखथे, ओला सिरिफ आंखी से देखे नहीं, ओला जियरा से महसूस करे जा सकथे। ललित निबंध के असल सुवाद ओकर तरलता में होथे, अउ छत्तीसगढ़ी भाखा से जादा तरल, मयारू अउ कोमल अउ कउन सा भाखा होही?
अषाढ़ के पहिली पानी अउ ‘अउती’
जब जेठ के कड़कड़ात घाम के बाद अषाढ़ के पहिली पानी हमर भुइँया में गिरथे, त माटी से एक अइसन सोंधी खुशबू उठथे जउन सीधा मन के भीतर समा जाथे। ओ सोंधई में कउनो इतर (परफ्यूम) के कतरा घलो के महक फीका पड़ जाही। ओहा सिरिफ माटी के महक नो हे गा, ओहा आबोहवा में घुले हमर किसान भाई मन के जनम-जनम के मिहनत, ओ मन के आँसू, ओ मन के हांसी अउ आने वाला दिन के अटूट भरोसा के महक ए। खेत मन जोत के तैयार हो जाथे अउ सबो डहर सिरिफ एक ही आस रहिथे—‘अब बरखा रानी आही, हमर करम जागेही, अउ कोठी धान से भर जाही।’
जेठ महिना के घाम में जब भुंइयाँ तपत रहिथे, त किसान भाई मन अपन खेत ला बनाय में जुट जाथें। ओला हमर बानी में ‘खेत सुधारना’ कथें। मेढ़ ला बांधना, खाद रितोना, अउ नागर-बैल लेके खेत डहर निकल जाना। अषाढ़ के आगमन होत चइत-बैसाख के सुक्खा भुइँया में जीव आ जाथे। जब पहिली पानी गिरथे, त ओकर बाद ‘अउती’ (पहिली बोआई) के दिन आथे।
किसान अपन कुलदेवता अउ अनकुंवारी दाई ला सुमिर के खेत में धान के बीज छिटकथे। ओ बीज सिरिफ धान के दाना नो हे, ओहा किसान के सपना ए, जउन माटी के कोरा में सो जाथे ताकि कहुं दिन बाद हरियर पौधा बनके जाग सके। ये समे म गाँव के माहौल एकदम बदल जाथे। सबो डहर नागर के ‘चर्र-चर्र’ अउ बैल मन के गले में बंधे घंटियाँ ‘छन-छन’ बाज उठे। किसान के मुंह से बैल मन बर ‘ले… हुर्र… जा…’ के गोठ, गीत गूँजथे। ये अइसन संगीत ए, जउन कउनो बड़े थियेटर में नइ मिलय। माटी अउ पानी के मिलन से जउन चिखला बनथे, ओकर महक में एक अजब के नसा होथे। ओ चिखला में सने किसान के पैर अइसन लगथे जैसे भुंइयाँ दाई अपन लइका ला कोरा में ले के दुलार करत हे।
हरेली के तिहार अउ परकिति के पूजा
सावन महीना के अउती ही छत्तीसगढ़ में ‘हरेली’ के तिहार लेके आथे। ये हमर छत्तीसगढ़ के पहिली तिहार ए, जउन सबो तरह ले माटी, परकिति अउ खेती उपकरण मन ला समर्पित हे। हरेली के दिन तक खेत मन में सूजी कस नान-नान धान के पौधा निकल आथे। सबो भुंइयाँ हरियर मखमली चद्दर ओढ़े कस दिखथे।
हरेली के दिन किसान अपन नागर, कुदारी, रापा, अउ टंगिया ला धो-धा के ओकर पूजा करथें। चीला अउ मुठिया के भोग लगाय जाथे। गाय-बैल मन ला अउषधि (भेंडी अउ नून) खवाए जाथे ताकि ओ मन बेमार झन पड़य। घर के दुवार में नीम के डारी खोसे जाथे, जेकर से कउनो बइहा-बिमारी घर के भीतर झन आवय। अउ लइका मन बर त हरेली अमरित बरोबर आथे। बांस के ऊंच-ऊंच ‘गेड़ी’ बनाय जाथे। लइका मन गेड़ी चढ़ के चिखला-पानी के ऊपर ‘टप-टप’ चलथें। ओ मन के हांसी अउ गेड़ी के आवाज से जम्मो गाँव भर म गूंज उठथे। हरेली इही सिखाथे कि हमर जीबन परकिति से अलग नइ हे, हम ओकर पूजा करथन अउ ओकर प्रति अभारी रहिथन।
सावन के फुहार अउ रोपा के गीत
हरेली बीतते ही सावन अपन पूरा सबाब में आ जाथे। अब दिन आथे ‘रोपा’ के। छत्तीसगढ़ी लोकजीवन में रोपा लगाना कउनो मजदूरी या बुता नो हे, येहा एक उत्सव ए, एक बहुत बड़े सामाजिक मेला ए। जब कउनो एक जन के खेत में रोपा होथे, त पूरा गाँव के दाई-बहिनी अउ भाई मन ओकर खेत में आ जाथें। ओला हमर यहाँ ‘बदला-बोझा’ या आपसी सहयोग कथें। आज तोर खेत में, काल्ह मोर खेत में।
घुटनो भर पानी अउ चिखला से भरे खेत में जब दाई-बहिनी मन एक लाईन में खड़े होथें, त अइसन लगथे जैसे कोई चित्रकार हरियर रंग से भुइँया में चित्र बनावत हे। रोपा लगाना एक कला ए। अंगुरी मन अब्बड़ फुर्ती से धान के ‘थार’ ला पकड़थें अउ चिखला में गाड़थें, ओला देखना अपन आप में एक सुख ए। पर असली जादू तब बिखरथे जब रोपा लगावत-अउत दाई मन के कंठ से ‘ददरिया’ फूटथे।
“एक डहर रोपा रोपे, एक डहर बोवे धान गोइया… तोर मया के मारे, छूटगे मोर परान गोइया…”
ये गीत मन में कउनो बनावट नइ होय। येमा जियरा के पीरा, मया, अउ सावन के फुहार के मिठास होथे। एक कोती दाई मन गीत उठाथें, त दूसर कोती से दूसर टोली ओकर जवाब देथे। सुवाल-जुवाब के ये सिलसला में कतको घलो घाम होय या पानी गिरे, बुता के थकान कहुं बिला जाथे। हाथ चिखला में बुड़े रहिथे, पर मन अगास में उड़त रहिथे। इही ए छत्तीसगढ़ी आत्मीयता।
भादों के गहिराई अउ भुइँया दाई ले मया
सावन ढलथे अउ भादों के महीना आथे। भादों याने गंभीर रूप। पानी कभू थोरकिन थमथे, त घाम चटक हो जाथे। ये समे धान के फसल अपन जवानी में होथे। खेत मन करवट बदले लगथें। चारों मुड़ा सिरिफ हरियाली अउ हरियाली, पर अब ओ हरियाली में एक गजब के चमक आ जाथे। धान के पौधा मन अब बड़ हो चुके रहिथें, ओ मन में ‘दूध’ भरे के दिन आ जाथे, जेला हमन ‘गेभ’ आना या ‘दुधहिया होना’ कथन।
जब पुरवा हवा चलथे, त मील दूर तक फइले लहलहावत धान के फसल अइसन डोलथे जैसे कोई समुंदर के लहरा होय। हवा के संग धान के पात मन के आपस में टकराना एक अइसन सुघर ‘सरसराहट’ पैदा करथे, जेला सुनके मन घलो शांत हो जाथे।
खेत के मेढ़ में एक नानकुन ‘टपरी’ (मड़वा) बना के जब किसान भाई बइठथे, अउ अपन हथेरी में तंबाकू (मल्हूँ) घिसत-घिसत अपन फसल ला देखथे, त ओकर आंखी में एक चमक होथे। ओ चमक में ओकर लइका के बिहाव, घर के छप्पर सुधारना, अउ नवा लुगरा-धोती बिसाए के सपना तैरत रहिथे। ओ लहलहावत पउधा मन में ओला अपन खून-पसीना के सुफल दिखथे। ओकर आत्मीयता अपन खेत से अब्बड़ गहरा हे, ओला इही बात से समझे जा सकथे कि ओहा अपन खेत ला ‘भुइँया दाई’ कहिथे। ओकर बर खेत सिरिफ भुंइयाँ के टुकड़ा नो हे, ओकर जियरा ए, ओकर भगवान ए। वोहा खेत के मेढ़ म चलत समे चप्पल उतार देथे, ताकि धरती दाई ला दुख झन होवय। अइसन निश्छल मया अउ कहाँ मिलही?
भादों के महिना में ही ‘भोजाली’ के तिहार आथे। ये तिहार परकिति के अंकुरण सक्ति अउ मनखे के अटूट मितानी के परतीक ए। दाई-बहिनी मन टोकरी में माटी भर के ओमा धान या जँवार के बीज बोथें। कहुं दिन तक ओकर सेवा करे जाथे, ओला अगास के धूप से बचा के घर के भीतरी रखे जाथे, जेकर से ओकर पत्ती मन हरियर नइ, एकदम पियंरा (पीला) कस सुंदर दिखथें। भोजाली के दिन ओ सुंदर अउ पावन भोजली दाई ला नदी या तरिया म बिसर्जन करे बर सबो झन जाथें। ओ समे गाये जाने वाला गीत मन के भाव अब्बड़ सुंदर होथे:
“अहो देवी भोजली, महानदी तीर लहरें… होये जाहो भोजली, दीदी के सहेली…”
बिसर्जन के बाद, भोजली के एक-एक पत्ती ला एक-दूसरे के कान में खोस के ‘भोजली बदने’ के परंपरा हे। एक बार कउनो ला भोजाली बद लेवे, त ओ जनम-जनम बर मितान बन जाथे। ओकर बाद ओ मन एक-दूसरे ला नाम से नइ, सिरिफ ‘भोजली’ कहके बलाथें। ये परंपरा देखाथे कि छत्तीसगढ़ में धान अउ परकिति सिरिफ पेट भरे बर नो हे, वो रिस्ता जोड़े बर घलो ए।
बासी के सुवाद अउ लोकजीवन के मिठास
धान के कटोरा के ये महक हमर खान-पान में घलो रचे-बसे हे। सावन-भादों के महीना में जब किसान दिन-रात खेत में मिहनत करथे, त ओकर परान कउनो छप्पन भोग में नइ, ‘बासी’ में अटकते रहिथे। बासी—याने रात के बचे भात में पानी डार के रखना अउ बिहनिया ओला खाना। येहा सिरिफ गरीबी के अमृत नो हे गा, येहा छत्तीसगढ़िया मन के ताकत के राज ए।
खेत के मेढ़ में बइठ के, हाथ-पेर के चिखला ला पानी में धो के, जब किसान भाई ‘बासी’ के कटोरा ला धरथे, संग में गोंदली (प्याज), पाताल (टमाटर) के चटनी, अउ चेंच भाजी या माथान म बोरे अंचार होय… त ओ सुवाद के आगे दुनिया के सबो महँगा होटल के खाना ह पानी भरथे। बासी खाय के बाद जो ‘तसल्ली’ मिलथे, अउ ओकर बाद जो परछी में आधा घंटा के सुस्ताई होथे, ओ सुख ला कउनो राजा-महाराजा घलो नइ पा सके। धान हमर थाली में सिरिफ भात बनके नइ आवय, वोहा चीला, फरा, मुठिया, चौसेला, ठेठरी, अउ खुरमी बनके हमर जीबन में मिठास घलो घोरथे।
माटी के अमर चिनहारी
आज के समे में दुनिया बदलत हे। बड़-बड़ फैक्ट्री बनत हें, मनखे मन सहर कोती भागत हें। पर आज घलो हमर छत्तीसगढ़ के आत्मा ओकर खेत-खार में ही बसथे। जब तक ये भुइँया में धान के महक हे, जब तक सावन में ददरिया गूंजही, अउ जब तक किसान के हाथ माटी ला चूमते रहिही, तब तक हमर छत्तीसगढ़ समृद्ध अउ मयारू बने रहिही।
धान के कटोरा के ये महक सिरिफ खेत तक सीमित नइ राहय, येहा हमर सुभाव में घलो घुलकर छत्तीसगढ़िया मन ला ‘सबले बढ़िया’ बना देथे। यहाँ के मनखे मन के मन घलो धान के दाना कस निस्छल अउ साफ होथे। कउनो घलो परदेसी आवय, ओला इहाँ अइसन मया मिलथे कि ओहा इहीं के हो जाथे। इही ए हमर छत्तीसगढ़ के माटी, परकिति अउ लोकजीवन के असली सुग्घरता।
हमर दुआ हे कि हमर ‘धान के कटोरा’ के ये सोंधी महक जुग-जुग तक अइसने ही महकत रहे, अउ हमर भुइँया दाई सबो के कोठी ला धान ले भरत रहे।
