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पुरखौती / पर्यटन

धर्म अऊ अध्यात्म के ठऊर राजिम मेला

By Araitutari Editor Published February 8, 2026
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मांघी अउ फागुन के महीना हर लोगन मन बर बहुत ही खास रहिथे, अउ रही काबर नहीं.. मांघी पुन्नी के मेला जे लगथे। अतेक बड़ कुम्भ के मेला राजीव लोचन धाम मा भराथे। जेन मनखे मन राजिम जइसे पवित्र स्थान मा रहिथे, तेखर भाग तो खुलबे करही। संगवारी हो, हमर राजिम के मेला-मैदान हर पन्द्रह दिन पहिली भराये के शुरू हो जाथे। ये मेला हर महाशिवरात्रि तक रहिथे।

प्रिया देवांगन “प्रियू”, राजिम (गरियाबंद)

देवत हावँव नेवता, आवव जुरमिल लोग।
दर्शन कर भगवान के, खाहु पीड़िया भोग।।

गदबद-गदबद मेला मैदान हर करत रहिथे। माँघ पुन्नी के दिन बड़े बिहनिया ले लोगन मन महानदी, पैरी अउ सोंढूर नदी के संगम मा स्नान कर के राजीवलोचन अउ कुलेश्वर महादेव मा जल चढ़ाथें, पूजा पाठ करथें। उही दिन ले मेला के शुरुआत घलो होथे। बड़े-बड़े झूला, सरकस, किसम-किसम के खाई-खजाना इही मेला मा तो देखे ला मिलथे। बाहिर ले लोगन मन आथें। बड़े-बड़े साधु-संत मन घलोक आश्रम मा विराजमान रहिथें।

सब ले बड़े खुशी के बात ये हरे कि आजकल के लोग-लइका मन अपन पढ़ई-लिखई मा अतेक व्यस्त रहिथें कि बाहरी दुनिया, मेला-मड़ई, पुरखौती जिनिस ला जानबे नइ करँय। कुछू पूछ देबे त दाँत ला खीस ले निकाल देथें। जानबे नइ करय तेन काला बताहीं। पर ये मड़ई-मेला मनोरंजन,आपसी मेल-मिलाप ला जाने के बने साधन हरे।
मड़ई-मेला के समय जवान लागे न बुढ़ुवा सब अपन-अपन काम-बुता मा लगे रहिथें। माईलोगन ला तो फुरसद घलो नइ मिलय काखरो घर आये-जाये के। सियान मन घर मा सुत के पहा दिही, फेर काखरो घर नइ जावँय। कुछ काम रहिथे, तभे उँखर गोड़ उसलथें।

जेन दिन ले मेला लगई शुरू होथे उही दिन ले लोगन घर सगा-सोदर के अवई-जवई शुरू हो जाथे। महाशिवरात्रि तक तो राजिम के सब घर मा सगा-सोदर मन के आगमन होवत रहिथे। घर वाले मन तो लोगन के जेवन-पानी के बेवस्था ला आघू ले कर के रखे रहिथें कि अई आज हमर फूफू मन आही, ता मोसी आही, ममा आही…। लोग लइका मन ला शुरू-शुरू मा बने लागथें, फेर दू-चार दिन बाद असकटा जाथें, काबर कि ओखर मन के दिनचर्या घलो बिगड़ जाथे पढ़ई-लिखई के। तेखर पाय हमर राजिम के स्कूल मन मा छूट्टी दे देथें, तेन बने लागथे।

लइका मन के धियान हर सरकस के भालू कोती रही कि पढ़ई-लिखई मा। ये बात घलो हरे कि आजकल सबझन हर अकेल्ला रहे के आदत बना डरे हे, तेखर पाय बनेच दिन बाद सब ले मिलई -जुलई होथे त बने लागथे। मेला-मड़ई मा अमीर लागे न गरीब, छोटे लागे न बड़े सब एक बरोबर रहिथें। जाति, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा के भेदभाव बिल्कुल नइ रहय; तेन बढ़िया लागथे।

चारो कोती देख, खुशी हर मन मा छाये।
माँघी पुन्नी रात, दरश भगवन के पाये।।
करे नदी स्नान, पाप जम्मो कट जाये।
जोहत रहिथे साल, माँघ मेला कब आये।।

अइसे तो मेला दिन भर रहिथे, फेर जेन मजा संझा ले रतिहा बेरा तक घूमे के रहिथे, वो मजा बिहना मा नइ रहय। पहिली दिन तो घर के सियान मन लइका मन ला भेज देथें, जावव बाबू हो…. काय-काय जिनिस आये हे तेन ला देख के आहू कहिके। लइका मन घलो अब्बड़ चतुरा, पहिली ले आगू ले घूम-घूम के आ जाय रहिथें ,तभो ले हमन तो देखेच नइ हन कहिके निकल जाथें। दूसर दिन ले घर के जम्मो सगा-सोदर, माईलोगन ,लइका-सियान मन जाथें। कोनो-कोनो लइका मन तो जब तक झूला बंद नइ होये, तब तक घूमते रहिथें, जानो-मानो उही मन मेला बंद करे के ठेका लेहे।

किसम-किसम के झूला तो हमर राजिम मेला मा आथें नवा-नवा डिजाइन के।सियान मन ला तो ये सब देखके चक्कर आ जाथे। फेर युवा पीढ़ी अउ नान-नान लइका मन के तो इही मजा रहिथे। आकाश-झूला जेन अइसे लागथे के जानो-मानो, आसमान ला छू दिही। डोंगा-झूला मा तो डोंगा मा बइठे हस तइसे लागथे, ब्रेकडांस चलते -चलत झटका के साथ मुड़ जाथे। सावधानी के साथ झूले ला पड़थे, नहीं ते घेंच हर धर लेथे। फेर मेला भर घर ले निकलना मुश्किल हो जाथे। पेंडुलम झुला मा बइठबे त बिना सहारा के नइ बइठ सकस। येती-वोती गोल-गोल घूम के चारों मुड़ा फेकावत रहिथे। जतका ज्यादा उल्टा-पुल्टा, नवा-नवा झूला आथे, वतकी ओखर रेट रहिथे। पहिली तो पाँच रुपिया दे के मन भर झूल लेवत रहेंन। अब तो पाँच के जमाना ही खतम होगे। बिना सौ-पचास के टिकिट नइ मिलय। महंगाई घलो बाढ़त जावत हे अउ झूलने वाला के जनसंख्या घलो बाढ़त हे। दूनों मा कोनो कमी नइ दिखय। नान-नान लइका मन बर घोड़ा, हाथी, ड्रैगन मन बने रहिथें। लइका मन खुश हो जाथें।

लोगन ला जब तक भीड़ नइ होय राहय, तब तक मेला मा मजा नइ आवय। कुछू खाय ला मिले चाहे झन मिलय ,पर धक्का-मुक्की जरूर खाय बर मिलथे। मेला मा खान-पान के सब ले खास जिनिस हरे लाई के ओखरा (मीठा लाई), पेठा, रखिया पाग ये जिनिस सब ले फायदेमन्द रहिथे । ये जिनिस ला मेला के विशेष मिठाई के रूप मा माने जाथे। मेला मा अइसन भीड़ रहिथे। पाँव रखे के जगह नइ रहय। सरकस, मौत कुआँ, बड़े-बड़े क्राफ्ट बाजार लोगन के मन ला मोह लेथे। माईलोगन मन कुछू जिनिस नइ लेवन बोलथे फेर समान ला देख के मोहा जाथें ,एक के जगह दू-चार जिनिस धर के लेगथें । किसम-किसम के जिनिस ला देख मन बड़ अच्छा लगथे। आजकल के लइका मन नइ जाने तेन ला जाने के मौका मिलथे। सुपा-पर्रा , बांस के बने खिलौना- हाथी, घोड़ा, ऊँट अउ मिट्टी के बर्तन,चीनी मिट्टी के बर्तन, लकड़ी के सामान वगैरा।

घूम घूम के खाव, लगे हे पुन्नी मेला।
पेठा गुपचुप चाट, खड़े हे जम्मो ठेला।।
आवय घर घर लोग, सगा सोदर संगवारी।
बाढ़य मया दुलार, घूमथे पारी पारी।।

जेन लोगन ला मन्दिर दर्शन कर ना रहिथें , तेन बिहनिया चार बजे ले लाइन लगा लेथें। उहाँ घलो पाँव रखे के जगह नइ रहय। थोकिन सुरुज उए ले लोगन के कचाकच भीड़ उमड़े ला लगथे। जेकरे भाग बने रहिथे, तेने ला भगवान के दर्शन मिलथे, बाकी तो मनखे-मनखे एक-दूसर ल देख के आ जाथे। भीड़ मा न नरियल चघाय ल देवे, न पाँव परे ला। अगरबत्ती तो बहुत दूर के बात हरय, काखरो फूल हर भगवान तक नइ पहुँचे, काबर की बड़े जान बांस ला पहिली ले घेर दे रहिथे। जय भगवान-जय भगवान बोलो अउ आघू निकलो। फेर जाना चाही, मन्दिर मा पाँव रखे मात्र से ही भगवान के आशीर्वाद मिल जाथे, अइसे घर के सियान मन कहिथे।

कचाकच मेला भराय के समय नदिया मा भिखारी, लुटेरा अउ पाकिटमार के बनेच कमाई हो जाथे। भिखारी अउ लुटेरा मन के साल भर के कमाई पन्द्रह दिन मा हो जाथे। चोर अउ पाकिटमार ले बच के रहना चाही। माईलोगन मन ला तो गहना पहिर के जाना ही नहीं चाही, नहीं ते फेर गहना नइ बाँचय। कतको पुलिस बेवस्था रहिथे, तभो ले पाकिट मार होथे ही। इहाँ भिखारी मन के माँगे के नवा -नवा आइडिया घलो देखे ला मिलथे। कोनो हाथ-गोड़ मा पट्टी बाँध के आ जाथे त, दया के मारे ये दाई-बिचारा के हाथ टूट गेहे दू-चार रुपिया दे देथो.. भला होही, पुण्य मिलही, कहिके मनखे मन दे देथे। अतेक नरम हो के माँगथे – दे दे न दीदी, दे दे न वो बहिनी, हमू मन थोकिन मेला घूम लेबो, मांग के खाथन ओ। जेन लोगन ओखर बात मा पिघल जाथें, मानो पूरा लूटा जाथें। जइसे ही पइसा सकलाथे, ओखर बाद जेकर हाथ मा पट्टी बंधे रहिथे तेकर हाथ तुरते ठीक हो जाथे अउ दारू पी के घोंडे रहिथें। संगवारी हो ! हमर राजिम मेला आहू त येखर मन के बनेच दुरिहा रइहू, नहीं ते लुटा जाहू। फेर आये बर झन बिसराहू।

गहना जेवर के बने, रखहू जम्मो ध्यान।
चोर लुटेरा घूमथे, लेगय लूट समान।।

जेन कुछू जिनिस लेन-देन करना हे.. खास राजिम के लोगन मन आखरी दिन मा जाथें। नाना प्रकार के जिनिस ले के आथें अउ सस्ता मा पाथें, काबर की दुकानदार मन ला जल्दी अपन घर जाना रहिथें त कम रेट म बिसाथे तेला बासी मेला घलो कहिथे। ये हर शिवरात्रि के दू दिन तक रहिथे। पन्द्रह दिन के कुम्भ के मेला बड़ा ही आंनदमय रहिथे। समय हर अतेक जल्दी-जल्दी निकलथे पता ही नइ चले। मोला तो अइसे लागथय कि हमर राजिम मेला ह महानदी, पैरी अउ सोंढूर नहीं, भलुक जाति, धर्म अउ सम्प्रदाय के संगम भराय अमीर-गरीब सबके मेला आय। जय जोहार।

पावन राजिम धाम के, महिमा अपरंपार।
दूनों हाथ ल जोड़ के, करथँव मँय जोहार।।

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