छत्तीसगढ़ के गांव-गांव म ग्रामदेवी के पूजा-पाठ अउ सेवा-अरधना के नेम-धरम जुन्ना जमाना ले चलत आवत हे। इहां देवी-देवता मन के ठउर कोनो बड़े महल-अटारी म नइ, बल्कि जुन्ना रुखराई, प्राकृतिक जघा अउ गांव के सिवाना म बने रहिथे। अइसने एक अगाध लोकआस्था अउ 300 बछर जुन्ना इतिहास ल अपन कोरा म समेटे हे बोड़सरा गांव के ‘मइनका दाई’। गुड़ीपारा के अमली रुख तरी बिराजे दाई के कहिनी आज घलो मनखे मन के हिरदे म रचे-बसे हे।
कलचुरी काल के इतिहास अउ ‘रानी के आसरा’
गांव के सियान मन बताथें कि लगभग 300 बछर पहिली बोड़सरा, रतनपुर के कल्चुरी राजा मन के अधीन रजवाड़ा क्षेत्र के एक प्रमुख बाटा रिहिस। ओ बखत ए गांव ल ‘रानी के आसरा गांव’ के नाव ले जाने जात रिहिस। रतनपुर के सपेटा जमींदार तपसी बाबा अक्सरहा ए गांव म आवत-जात रहंय।
जब अमली तरी आके रुक गे घोड़ा
कहे जाथे कि तपसी बाबा रतनपुर के महामाई दाई के सिद्ध अउ बड़े भगत रहंय। एक बेर के बात आय, जब बाबा अपन घोड़ा म चढ़के बोड़सरा आवत रहिन, तभे अमली (इमली) पेड़ के तरी पहुंचतेच ओकर घोड़ा अपन मन रुक गे। बनेच उदिम अउ कोशिश करे के बाद घलो घोड़ा एक डग आघू नइ बढ़िस।
तपसी बाबा जब धियान लगाके देखिन, त ओमन ल अमली पेड़ के तरी मइनका दाई के अलौकिक रूप के दरसन मिलिस। एकर बाद बाबा ह तुरते गांव के गौटिया ल बलवाइस अउ ओ जघा म पूरे विधि-विधान संग मइनका दाई के इस्थापना करवाइस। ओ दिन ले आज ले मइनका दाई बोड़सरा गांव के रच्छक बनके बिराजे हे।

दुख-पीरा हरइया मइनका दाई
कहे जाथे कि कोनो घलो परानी जब अपन जिनगी के दुख-पीरा लेके दाई के दुवार म गोहराथे, त ओकर बिगड़े काम बन जाथे अउ दाई ओकर सबो पीरा हर लेथे। अस्ते-कना ए ठउर पूरा गांव के भाव-भगती अउ आस्था के मुख्य केंद्र बन गे।
300 बछर ले इतिहास के साखी बने हे अमली रुख
आज घलो बोड़सरा के गुड़ीपारा म ओही अमली पेड़ के तरी मइनका दाई अपन सुग्घर रूप म विराजमान हे। लगभग तीन सौ बछर ले ए अमली रुख बदलत बखत, आवत-जावत पीढ़ी अउ इतिहास के कतको दौर के अमर साखी बने ठाढ़े हे। जमाना बदल गे, पीढ़ी बदल गे, फेर मइनका दाई बर मनखे मन के श्रद्धा तनिक भर नइ घटिस। आज मंदिर समिति अउ सेवादार मन के निसवारथ सेवा के सेती मइनका दाई के ठउर बोड़सरा के मान-गोन अउ पहचान बन चुके हे।
प्रस्तोता
त्रिभुवन लाल साहू
स्रोत
दुर्गेश साहू
समीक्षा
खम्हन प्रसाद साहू
बोड़सरा जांजगीर
