रेंग तँय ह सत के रद्दा म, असत ले छोड़ा ले पाछू।
आखिर म जीत होही तोर, रहिबे सब जन ले आगू।।
दाई-ददा के सेवा कर, जीते-जियत म मत दे दुख।
सियान के कहना ल मान, बाद म पाबे तँय ह सुख।।
पर नारी ल माता मान, झन लगा ओखर बर बानी।
रावन घलो ह नइ बाँचिस, जेन ह रहिस अभिमानी।।
अदि करना हे त मदद कर, गरीब मन के कर भला।
तोला दुआ मिलही उँकर, मन म खुशी के दीया जला।।
मितान मेर निभा मितानी, सुख-दुख म संग दे ओला।
आगू-के-आगू ले कर बूता, तभे जम्मो सहराहीं तोला।।
गुरु के हरदम कर बंदना, ओखर मत करबे अपमान।
तँय ह सबले बढ़िया बनबे, जग म पाबे खूब सम्मान।।
जब भी बोल गुरतुर बोल, हमेशा काम के पूरता बोल।
चारी-खोदारी ले दुरिहा रह, जिनगी म महुरा मत घोर।।
लड़ई, झगरा ले कोनों नइ बने, होथे ग बिंदरा-बिनास।
छीन भर के गुस्सा हे अंगरा, जरो के करथे सत्यानाश।।
दारू-मंद के चक्कर छोड़, जियन दे बोकरा, कुकरी ल।
पढ़-लिख के लायक बन, गियान मंतर फूँक फूँकनी म।।
एकता ले रहव जुरमिल, देश बिकास खातिर काम कर।
फेर आही संगी रामराज, तँय तो प्रभु राम जइसन बन।।
कवि
अशोक कुमार यादव
मुंगेली, छत्तीसगढ़
