सुघ्घर माघ महिना आगे,
पीलाराम वर्मा (अछोटी), भिलाई नगर
मनभावन होगे पुरवाई।
उमंग भरत हे तन मन में,
मौसम लागत सुखदाई।।
हरिहर-हरियर खेत-खार,
उलहोवत हे रूख राई।
उड़-उड़ के चिरई चिरगुन,
करत बसंत के अगुवाई।।
गांव-गांव में खुशी छागे,
चलत हे मड़ई के दौर।
रतिहा गम्मत देखे बर,
छेंकत हे आगू ले ठौर।।
माघी पुन्नी मेला लगही,
बइला गाड़ी के सवारी।
घांघरा बाजत बइला हा,
दउंडत हाबय जी भारी।।
आमा, कउहा, मउँहा हा,
गजब के ममहावत हे।
संग चलत हे पवन के,
नवा ताजगी लावत हे।।
रतिहा थोकन जुड़ लागे,
दिन भर सुग्घर घाम।
बसंत आय ले माघ के,
पावन होगे जी नाम।।
खुशी लावत जिनगी में,
बहुत मजा तिहार के।
बाजत खूब नंगारा हा,
गीत बसंत बहार के।।
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