छत्तीसगढ़ के प्रयागराज के नाँव ले प्रसिद्ध राजिम जेन ल संस्कारधानी के नाँव ले घलो जाने जाथे। इलाहाबाद कस राजिम के महत्व हवय। इहा 8-9 वीं शताब्दी म बने मूर्ति के संगे संग अलग-अलग जाति सम्प्रदाय के मूर्ति विराजमान हवय। प्रयागराज राजिम गरियाबंद जिला म स्थित हवय । जिला मुख्यालय ले 15 कोस के दूरिहा म अउ राजधानी रायपुर ले 17 कोस के दूरिहा म हवय धार्मिक नगरी राजिम ह।
प्रीतम कुमार साहू ‘गुरुजी’, लिमतरा,धमतरी
कहे जाथे कि जेन मनखे ह भगवान जगन्नाथ के यात्रा बर निकले रहिथे उँकर यात्रा राजिम के राजीव लोचन अउ कुलेश्वर महादेव के दर्शन बिना अधूरा माने जाथे। एकरे सेती राजिम म देश बिदेश ले घलो मनखेमन अउ साधुमन ह आथे । राजिम छत्तीसगढ़ के सभ्यता,संस्कृति अउ धार्मिक रीति रिवाज के परिचय कराथे।
नदियां खड़ म भराथे जबर मेला
नदियां खड़ म मांघी पुन्नी ले महाशिवरात्रि तक 15 दिन ले सरलग जबर मेला भराथे । मेला म दूर दराज के मनखे मन के संगे संग देश बिदेश ले घलो मनखेमन राजिम कुंभ(कल्प) मेला आथे। माघी पुन्नी के दिन स्नान अउ दान के अड़बड़ महत्व होथे। जम्मों पबरित नदियां तिर म इहि दिन मेला भराथे। बछर भर ले मनखेमन मेला के अगोरा जोहत रहिथे। लइका, सियान, बुढ़वा,जवान जम्मों झन पुन्नी नहा के मेला घूमथे अउ अपन सगा पहुँना संगी संगवारी ले भेट मुलाक़ात करथे।
मेला के सुरुवात कल्पवास ले होथे
पखवाड़े भर पहिली भक्तमन पंचकोशी यात्रा बर निकल जाथे।यात्रा म पटेश्वर,फिंगेश्वर,ब्राह्मनेश्वर,कोपेश्वर अउ चम्पेश्वर नाथ के दर्शन करत धूनी रमावत 101 कि.मी. के यात्रा पुरा करथे तब मांघी पुन्नी ले मेला हर चालू होथे।
कतकोन बेरा बदलिस मेला के नाँव
सबले पहिली जगह के नाँव राजिम ले मेला के नाँव ‘राजिम मेला’ रिहिस। राज्य सरकार मेला के नाँव ल बदल के2001 म ‘राजीव लोचन महोत्सव’ रखिस, 2005 म ‘कुंभ’ के दरजा देवत नाँव ल बदल के ‘राजिम कुंभ’ राखिन । 2019 म नाँव ल फेर बदलिस अउ मेला के नाँव राखिन ‘राजिम मांघी पुन्नी मेला’ ।अब 2024 ले मेला के नाँव फेर कुंभ के नाँव जोड़त ‘राजिम कुंभ (कल्प) कर दे गे हवय। वर्तमान म राजिम मेला ल ‘राजिम कुंभ (कल्प) के नाँव ले ले जाने जावत हवय ।
त्रिवेणी संगम म हवय कुलेश्वर महादेव मंदिर
राजिम जेन ल त्रिवेणी संगम घलो कहे जाथे काबर कि इहा तिन ठन नदियां महानदी,सोंढूर ,अउ पैरी के मिलन होथे अउ उन मिलन जगह म नदियां के बीचो-बिच एक ठन प्रसिद्ध मंदिर हवय। जेन म भगवान शंकर के प्रतिक शिवलिंग विराजमान हवय। कहे जाथे कि माता सीता हर 14 बरस के बनवास काल म इहि राजिम संगम म स्नान करके अपन कुल देवता के विग्रह मूर्ति के पूजा करे रिहिस तेकर सेती ए मंदिर के नाँव कुलेश्वर महादेव मंदिर हावय।। महाशिवरात्री म मंदिर म भक्तन मन के बिकट भिड़ देखे बर मिलथे। मंदिर म लाइन रतिहा 4 बजे ले सुरु हो जाय रहिथे।
लक्ष्मण झूला
लक्ष्मण झूला सुने म ऐसना लागथे जइसे झूला रहचुलिया वाला झूला आय तइसे फेर ओसन बात नो आय। लक्ष्मण झूला 3 मीटर चौड़ा अउ 610 मीटर लम्बा एक ठन लोहा ले बने नदियां म बने एक पार ले दूसर पार जाय बर बनाए सेतु आय। जेकर एक छोर नदियां के पार म त दूसर छोर त्रिवेणी संगम म विराजमान कुलेश्वर महादेव मंदिर ले जुड़े हावय । सेतु के बने ले अब बारो महीना भगवान कुलेश्वर महादेव के दर्शन भक्त मन कर सकत हवय ।
साधु, संत के आगमन अउ स्नान
राजिम मेला म आस-पास ले लेके दूर दराज तक के जम्मों संत महात्मा,नागा साधु अउ अखाडा मन प्रयागराज म आथे अउ पखवाड़ा भर अपन डेरा जमाय रहिथे। विशेष पुण्य स्नान अउ संत समागम म सहभागी बनथे। लाखो के संख्या म आय भक्तमन भगवान राजीव लोचन अउ कुलेश्वर महादेव के दर्शन करके अपन जीवन ल धन्य मानथे। लोगन के मानता हवय कि भगवान जगन्नाथ के यात्रा भगवान राजीव लोचन अउ कुलेश्वर महादेव के दर्शन के बिना अधूरा हवय। राजिम मेला के अंचल म विशेष महत्व हवय ।
राजीव लोचन मंदिर
राजिवलोचन मंदिर चौकोना आकर म बनाए गे हावय। उत्तर अउ दक्षिण दिशा म प्रवेश द्वार हावय। मंदिर के दोनों दिशा म परिक्रमा पथ अउ भंडार गृह बने हवय। महामंडप के बिचान म गरुड़ हाथ जोरे खड़े हवय। महामंडप बारह प्रस्तर खम्भा के सहारा ले खड़े हवय। गर्भ गृह के आजु बाजू अउ उपर चित्र छपाय हवय। सांप के आकर के मनखे अउ मिथुन मूर्ति के चित्र उकेरे गे हवय। गर्भ गृह म राजिवलोचन सिहासन म बइठे हवय।मूर्ति करिया रंग के पथरा ले बने चारभुजा वाला विष्णु के मूर्ति आय। जेकर हाथ म शंख,चक्र,पदम अउ गदा शोभित हवय। लोचन के नाँव ले मूर्ति के पूजा होथे।
पीड़िया परसाद के महत्व
राजीव लोचन म जेन प्रसाद मिलथे उँन ल विशेष ढंग ले बनाए जाथे जेकर सेती उँकर विशेष महत्व हवय। प्रसाद के नाँव पीढ़िया हावय। पीडिया जेन ल जम्मों जाति संप्रदाय के लोगन मन ले जाथे। मानता हे कि पीड़िया प्रसाद मरत बेरा म कहु मनखे ल खवा देथे त उन ल सरग म जगह मिलथे। एकरे सेती कतकों गाँव म पीड़िया प्रसाद ल बने जतन के बछर भर ले राखे रहिथे। पीड़िया प्रसाद के अड़बड़ महत्व हावय।
सीताबाड़ी
राजीवलोचन मंदिर परिसर ले थोरिक दूरिहा म सीताबाढ़ी हावय जिहा 2800 बछर पहिली के तराशे हुए पथरा ले बने दिवार मिले हवय जेकर ले बड़का बड़का घर कुरिया बनाए जाय। वर्तमान म सीताबाढ़ी म पुरातत्विक अवशेष के घर आज घलोक देखे बर मिलथे।जेमा सम्राट अशोक काल के विष्णु मंदिर,मौर्य कालीन अवशेष, 14वी शताब्दी के सोना के सिक्का अउ मूर्ति के संगे संग सिंधुघाटी सभ्यता ले जुड़े कलाकृतीया मिले हावय। प्राचीन नगरीय सभ्यता के बिकास नदियां के तिर म होइस अउ इहा ले ही सभ्यता हर निखरिस ।महानदी के तिर अउ जलमार्ग होय के सेती इहा बंदरगाह होय के प्रमाण घलोक तर्कसंगत जनाथे।
राजिम तेलीन भक्तिन के नाँव ले परिन ‘राजिम’ के नाँव
प्राचीन काल ले राजिम ल तेल के व्यापार व्यवसाय के बड़का जगह माने जाथे। आज घलोक राजिम के आस पास तेल के व्यवसाय करैया मन के बहुलता देखे बर मिलथे । किंवदती के अनुसार राजिम तेलिन भक्तिन दाई अउ तेली समाज के बड़का भूमिका सुने बर मिलथे। इही कारण राजिम तेलिन भक्तिन बाई के नाँव ले राजिम नगर के नाँव राजिम रखिन हे। प्राचीन समय म एखर नाँव कमलक्षेत्र पदमावती पुरी के नाव ले जाने जावत रिहिन।
पिंडदान अउ श्राध
राजिम ल इलाहाबाद कस प्रयागराज माने जाथे। त्रिवेणी संगम होय के सेती इहा पिंडदान, श्राद अउ तर्पण करे जाथे। जेन मनखेमन पिंडदान अउ श्राद करे बर आथे उन मन ह भगवान राजिवलोचन के दर्शन करथे अउ प्रसाद लेके घर लहुटथे !
